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कबीर दास जी और उनके गुरू की कहानी


एक बार कबीरदास जी के गुरू ने कबीर दास जी से कहा पितर का समय है, हम भी पितर को भोजन करवाएंगे।
 जाओं कही से दूध का और बाकी खाने-पीने की साम्रगी का इंतजाम करों।
कबीर दास जी ने गुरू की कही बातों का पालन किय और दूध और खाने पीने की वस्तुओं के इंतज़ाम करने में लग गए। दूध आदि के लिए जा ही रहे थे कि रास्ते में एक गांय को मरा हुआ देखा। 
कबीर जी गांय के पास गए और गांय के सामने हरा चारा डाल दिया।

मरी हुई उस गांय के सामने चारा डाल दिया और खुद वहां बैठ गए। काफी समय होने पर कबीर जी के गुरू ने सोचा कबीरदास अभी तक क्यू नहीं आया? उनके गुरू कबीर दास को खोजने लगे कि तभी रास्ते में किसी ने कहा आपका चेला तो मरी हुई गांय के सामने घास डाल कर बैठा हुआ है।
ये सुनते ही कबीर दास के गुरू उनके पास जाकर कहा कबीरदास ये क्या कर रहा हैं, मैंने तो तुझे दूध लाने के लिए भेजा था, तु यहां इस मरी हुई गांय के सामने बैठा क्या कर रहा है? और ये घास क्यों डाली इस गांय को मरी हुई गांय घास कैसे खा सकती है।

इस पर जो कबीरदास जी ने कहा की गुरूजी जैसा कि ये मरी हुई गांय घास नहीं खा सकती, वैसे ही हमारे सैंकड़ो वर्ष पहले मरे हुए पूर्वज जिसे आप पितर कहते हो। वे कैसे खाना खा सकते है।
 कबीरदास जी की बात सुनकर उनके गुरू बहुत खुश हुए, और कहा बिल्कुल सत्य हमें देखा-देखी या ऐसे कोई काम नहीं करने चाहिए। जिनका कोई तात्पर्य ही नहीं होता हो।


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