आखिर क्यों कहा जाता है पुरमंडल को छोटी काशी

 


जम्मू शहर की पूर्व दिशा में करीब 30 किलोमीटर दूरी पर स्थित पुरमंडल को छोटी काशी के नाम से जाना जाता है। भूमिगत नदी देविका किनारे बसे पुरमंडल को शिवधाम कहा जाता है और जहां से देविका नदी उत्तर की तरफ मुड़ती है जोकि हिमालयन क्षेत्रों में बहने वाली नदियों में नहीं होता। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के कहने पर माता पार्वती यहां गुप्ता गंगा देविका के रूप में प्रकट हुई थी और भगवान भोलेनाथ से कहा था कि वो जहां-जहां से गुजेंगी तो भगवान भोलेनाथ को भी उनके साथ-साथ रहना है। तब भोले नाथ ने उन्हें कहा भा कि वो नदी के किनारे आठ शिव लिंगों के रूप में प्रकट रहेंगे। यह शिव लिंग इंद्रेश्वर, उमापति, बीरेश्वर, खड़गेश्वर, बीकेवेश्वर, भूतेश्वर, काशीऐशवर व गायऐश्वर है। कहा जाता है कि महाराजा गुलाब सिंह ने 1912 में यहां के प्राचीन मंदिरों में शिवलिंग की स्थापना की और गदाधर मंदिर का निर्माण करवाया जिससे इसका नाम छोटी काशी पड़ा। महाराजा गुलाब सिंह ने यहां पर 108 मंदिरों का निर्माण करवाया और प्रत्येक मंदिर में 11 शिवलिंग स्थापित किए गए। देविका के दूसरी ओर महाराजा ने अभिमुकतेश्वर मंदिर का निर्माण करवाते हुए यहां छह फुट के शिवलिंग की स्थापना करवाई। पुरमंडल मंदिर चट्टान के दोहरे तहखाने के कटआउट पर बनाया गया है और केंद्रीय मंदिर में स्वयं भू कुंड धार्मिक आस्था का केंद्र है। हजारों श्रद्धालु यहां नाग देवता का जलाभिषेक करते है और हजारों-लाखों लीटर पानी जाने के बावजूद यह हमेशा आधा भरा रहता है। मान्यता यह भी है कि इस कुंड में चाहे जितना भी पानी डाल दो यह न तो भरता है और न ही घटता है। मंदिर के बाहर बहने वाली गुप्त गंगा उपर से मानों कोई रेतीला रास्ता प्रतीत होती है लेकिन जैसे ही एक फीट तक रेत को खोदा जाए उसमें से पानी निकल आता है। यहीं कारण है कि इस देविका नदी को गुप्त गंगा का नाम भी दिया गया है। महाराजा अवंतिबरमन ने इस स्थान पर सबसे पहले मंदिर का निर्माण करवाया और बाद में गरीब लोगों की सुविधा को देखते हुए इस स्थान को महाराजा गुलाब सिंह ने इस प्रकार से विकसित करवाया कि जो लोग हरिद्वार में जाकर अपने पितरों के कर्मकांड नहीं करवा पाते थे उन्हें इस गुप्त गंगा में आकर कर्मकांड करवाने से वहीं पुण्य मिले जो हरिद्वार या काशी में जाकर मिलता है। मान्यता यह भी है कि इस गुप्त गंगा में मृतक देह का अंतिम संस्कार करने के उपरांत उसकी अस्थियां विर्सजन के लिए उठाने की जरूरत नहीं है वो स्वयं ही गुप्त गंगा में विलुप्त हो जाती है। अब तो प्रशासन ने लोगों की सुविधा के लिए देविका के दोनों तरफ दो श्मशान घाटों का निर्माण करवाया है ताकि लोग वहां पर आकर संस्कार आदि कर सकें।



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