शाम ढल चुकी थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन दिल में अजीब सी बेचैनी।
मुरीद उस्ताद के पास बैठा था, मगर उसकी आंखों में सवाल साफ दिख रहा था।
कुछ पल खामोशी रही… फिर उसने धीमे से कहा,
“उस्ताद… ये Nafs vs Rooh की जंग इतनी भारी क्यों लगती है?”
उस्ताद ने उसकी तरफ देखा, जैसे उसके दिल को पढ़ लिया हो।
“क्योंकि बेटा, ये जंग बाहर नहीं — तेरे अंदर चल रही है।”
“नफ़्स तुझे वो देता है जो तुरंत अच्छा लगे…
और रूह वो चाहती है जो हमेशा सही हो।”
उन्होंने एक मिसाल दी,
“जैसे अंधेरे कमरे में बैठा इंसान रोशनी से डरता है, क्योंकि आंखें आदत डाल चुकी होती हैं…
वैसे ही नफ़्स को रूह की सच्चाई भारी लगती है।”
मुरीद चुप हो गया।
उस्ताद बोले,
“हमारे नबी ﷺ ने सिखाया कि असली ताकत अपने गुस्से और नफ़्स को रोकना है…
और कुरआन हमें दिल को साफ करने की तरफ बुलाता है।”
“जब तू ज़िक्र करता है, सब्र करता है — रूह मजबूत होती है।
और जब तू नफ़्स के पीछे भागता है — दिल और भारी हो जाता है।”
✨ “नफ़्स शोर मचाता है, रूह सुकून से बुलाती है — सुनना किसे है, ये तेरे ऊपर है।”
उस्ताद ने आख़िर में कहा,
“जंग खत्म नहीं होगी… लेकिन सुकून उसी को मिलेगा जो हर बार रूह को चुन ले।”
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