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बाबा सिद्ध गोरिया नाथ की पूरी कहानी: राजा से सिद्ध बनने तक का सफर

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 राजमहल में रहने वाले आदमी के लिए सबसे मुश्किल चीज क्या होती है?

राजपाट छोड़ना?

धन-दौलत छोड़ना?

या अपना वह नाम छोड़ना, जिसके आगे लोग सिर झुकाते हों?

गोरिया की लोककथा का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद यही है।

कहानी उसे एक राजसी जीवन से जोड़कर शुरू होती है, लेकिन आगे चलकर वही गोरिया अपने पुराने जीवन से इतनी दूर चला जाता है कि उसकी पहचान राजा के रूप में नहीं, सिद्ध गोरिया नाथ के रूप में रह जाती है।

इस बदलाव के बीच एक दर्जी आता है।

एक योगी आता है।

गुरु गोरखनाथ आते हैं।

फिर बारह साल की तपस्या।

जंगलों और साधुओं के बीच यात्राएं।

स्वांखा में एक गरीब ब्राह्मण परिवार से मुलाकात।

कपला पीर से सामना।

और अंत में एक सरोवर, जिसके बीच आज बाबा की समाधि से जुड़ी परंपरा दिखाई देती है।

लेकिन यह सब एक साथ नहीं हुआ था।

गोरिया को वहां तक पहुंचने में एक लंबी राह तय करनी पड़ी।


गोरिया कौन था?

गोरिया की जन्मकथा के अलग-अलग लोकप्रचलित रूप मिलते हैं। किसी एक रूप को निर्विवाद इतिहास मानना मुश्किल है।

एक प्रचलित कथा उसे राजा वीरमदेव के राजघराने से जोड़ती है। इस कथा में गोरिया का शुरुआती जीवन राजसी वातावरण में बीतता है।

महल में उसके लिए किसी चीज की कमी नहीं थी।

लेकिन लोककथा का गोरिया उस जीवन में हमेशा के लिए नहीं रुकता।

उसके जीवन में धीरे-धीरे ऐसे प्रसंग आने लगते हैं, जो उसे सत्ता से दूर और साधना के करीब ले जाते हैं।

इसी बदलाव की एक कड़ी है एक दर्जी से जुड़ी कहानी।


वह कपड़ा जिसे सिलने के लिए सुई की जरूरत नहीं थी

दर्जी के सामने राजा का दिया हुआ आदेश था—ऐसा वस्त्र तैयार करना, जिसमें सुई और धागे का इस्तेमाल न हुआ हो।

काम सुनने में आसान था, लेकिन दर्जी जानता था कि बिना सिलाई के कपड़े को मनचाहा आकार देना संभव नहीं। कई कोशिशों के बाद भी जब कोई रास्ता नहीं निकला तो वह परेशान होकर एक दिन अपने घर आया।

उसी दौरान उसकी मुलाकात एक साधु से हुई।

वह साधु कोई सामान्य योगी नहीं थे। वे गुरु गोरखनाथ थे।

कथा के अनुसार, दर्जी ने अपनी परेशानी उनके सामने रखी। गुरु गोरखनाथ ने उसकी मदद की और उसे ऐसा उपाय बताया, जिससे राजा के आदेश के मुताबिक बिना सुई-धागे का वस्त्र तैयार हो सका।

दर्जी वह वस्त्र लेकर राजा के सामने पहुंचा।

राजा ने कपड़ा देखा तो हैरान रह गया। उसकी पहली जिज्ञासा यही थी—

“यह बनाया किसने?”

अब दर्जी के सामने सच बताने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। उसने राजा को उस साधु के बारे में बताया, जिससे उसकी मुलाकात हुई थी और जिसने यह असंभव-सा काम संभव कर दिया था।

यहीं से गोरिया को गुरु गोरखनाथ के बारे में पता चलता है।

राजा ने उसी समय उस साधु को अपने सामने बुलाने का आदेश दिया।

दर्जी गुरु गोरखनाथ को लेकर राजमहल पहुंचा। और जब गोरिया ने पहली बार उस योगी को सामने देखा, तो कथा के अनुसार उनकी नजर गुरु गोरखनाथ के व्यक्तित्व पर ठहर गई। वे उनके चरणों में झुक गए।

यही वह मुलाकात थी, जिसने गोरिया के जीवन की दिशा बदल दी।


गुरु के सामने गोरिया की राजसी पहचान की कोई कीमत नहीं थी

राजमहल में गोरिया कौन था, यह महत्वपूर्ण था।

गुरु की संगत में वह कौन है, यह सवाल बिल्कुल अलग था।

वहां न राजपाट काम आता था, न वैभव।

गोरिया को साधुओं के साथ रहना था।

गुरु की आज्ञा माननी थी।

और उस जीवन को स्वीकार करना था जिसमें सुविधा से ज्यादा साधना थी।

धीरे-धीरे उसकी पुरानी पहचान पीछे छूटती गई।

कथा में गुरु गोरखनाथ के साथ गोरिया के संबंध को उसके जीवन के इस बड़े परिवर्तन से जोड़ा गया है। आगे चलकर यही गुरु-शिष्य संबंध उसकी साधना का आधार बनता है।

लेकिन गुरु की राह पर चलना केवल वस्त्र बदल लेने से पूरा नहीं होता।

अभी असली परीक्षा बाकी थी।


फिर गोरिया को जंगल में छोड़ दिया गया

गुरु गोरखनाथ ने उसे साधना के लिए तपोवन में रहने की राह दिखाई।

गोरिया वहीं रह गया।

चारों तरफ जंगल।

पास धूनी।

दिन का कोई भरोसा नहीं कि कब खत्म होगा और रात का कोई हिसाब नहीं कि कब बीतेगी।

लेकिन साधक वहीं बैठा रहा।

एक दिन दो दिन नहीं।

लोककथा में बारह साल की तपस्या का प्रसंग आता है।

बारह साल का समय किसी साधारण इंसान के जीवन में बहुत लंबा होता है।

लेकिन गोरिया के लिए यही समय उसकी पुरानी पहचान को पीछे छोड़ने का समय बन गया।


बारह साल बाद गुरु लौटे तो गोरिया दिखाई नहीं दिया

गुरु गोरखनाथ वापस आए।

लेकिन जिस शिष्य को उन्होंने तपस्या के लिए छोड़ा था, वह सामने नहीं था।

आसपास देखने पर भी गोरिया कहीं दिखाई नहीं दिया।

लोककथा के विस्तृत रूप में चरवाहों से पूछने पर पता चलता है कि वह वर्षों से उसी स्थान पर तपस्या कर रहा था। साधना इतनी लंबी चली कि उसका शरीर मिट्टी और बरमी से ढक गया था। गुरु ने उसे पुकारा और तब भीतर से गोरिया की आवाज आई।

गुरु ने उसे बाहर निकाला।

इसके बाद उसे सिद्ध साधक के रूप में स्वीकार किए जाने और नाथ परंपरा में संस्कार दिए जाने का प्रसंग आता है। यहीं से सिद्ध गोरिया नाम की पहचान मजबूत होती है।

यह दृश्य गोरिया की पूरी कथा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है।

जिस व्यक्ति ने कभी राजसी जीवन देखा था, वह बारह साल बाद गुरु के सामने तपस्या से निकला साधक था।


अब गोरिया की राह राजमहल नहीं, यात्राओं की थी

तपस्या के बाद गोरिया एक जगह नहीं रुका।

वह साधुओं के साथ अलग-अलग स्थानों पर गया।

कहीं धूनी जली।

कहीं साधुओं की मंडली मिली।

और कई जगहों पर उसके जीवन से ऐसी घटनाएं जुड़ती गईं जिन्हें बाद में लोग चमत्कार के रूप में सुनाने लगे।

यहीं से गोरिया की कथा में एक नया रंग आता है।

अब वह सिर्फ गुरु का शिष्य नहीं था।

लोग उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आने लगे।


कपला पीर से सामना

गोरिया की यात्राओं से जुड़ी कथाओं में कपला पीर का प्रसंग खास है।

कथा के अनुसार, गोरिया साधुओं के साथ एक स्थान पर पहुंचा जहां धूनी जल रही थी।

वहां कपला पीर से उसका सामना हुआ।

इसके बाद दोनों की सिद्धि को लेकर चुनौती की स्थिति बनी।

कपला पीर शेर पर सवार हुए।

गोरिया ने कच्ची दीवार को ही अपना वाहन बना लिया।

एक तरफ शेर।

दूसरी तरफ दीवार।

और फिर दोनों के बीच मुकाबला हुआ।

लोककथा के अनुसार, इस संघर्ष में गोरिया ने कपला पीर को परास्त किया और उन्हें दूर राहड़ा गांव की ओर फेंक दिया। यह प्रसंग गोरिया की चमत्कारिक लोककथाओं का हिस्सा है।

लेकिन गोरिया की कहानी का सबसे मानवीय प्रसंग अभी बाकी था।

वह स्वांखा में हुआ।


स्वांखा में एक गरीब घर के दरवाजे पर पहुंचे बाबा

यात्रा करते हुए गोरिया स्वांखा पहुंचे।

वहां उन्होंने एक घर में भिक्षा मांगी।

घर गरीब ब्राह्मण दित्तो का था।

अंदर माई मथुरा थीं।

घर में ज्यादा कुछ नहीं था।

देने के लिए अनाज थोड़ा था और शरीर ढकने के लिए उनके पास एक ही चादर थी।

बाबा ने उनकी स्थिति देखी।

लेकिन कथा के अनुसार, माई ने जो था वही सामने रख दिया।

यहीं से माई मथुरा और गोरिया के बीच का वह प्रसंग शुरू होता है जिसे स्वांखा की लोकपरंपरा में विशेष रूप से याद किया जाता है। 


सवा गज का तौलिया कैसे साड़ी बन गया?

माई मथुरा के पास तन ढकने के लिए पूरी साड़ी तक नहीं थी।

गोरिया ने अपना सवा गज का तौलिया उन्हें दे दिया।

माई ने उसे शरीर पर लपेटना शुरू किया।

कथा कहती है कि कपड़ा बढ़ता चला गया और साड़ी के रूप में उनके पूरे शरीर को ढक लिया।

माई के लिए यह केवल कपड़ा नहीं था।

यह उस साधु की कृपा का पहला अनुभव था जिसने उनके घर की गरीबी के बीच कदम रखा था।

फिर बाबा ने दूध मांगा।

घर में दूध नहीं था।

माई आसपास के घरों में गईं।

लेकिन कहीं से दूध नहीं मिला।

वह खाली हाथ लौट रही थीं।

इसी दौरान कथा में एक चमत्कारिक प्रसंग आता है—माई के शरीर से दूध की धारा निकलने लगी।

उन्होंने वह दूध बाबा को दिया।

गोरिया ने उन्हें ‘नाथ मां’ कहा।

यहीं से माई मथुरा का संबंध गोरिया से मां-बेटे जैसा बताया जाता है।


सूखा वटवृक्ष फिर हरा हो गया

माई मथुरा के घर के सामने एक सूखा वटवृक्ष था।

गोरिया ने वहीं धूनी लगाई।

कथा के अनुसार, उन्होंने अपनी पोटली उस सूखे पेड़ पर टांगी।

फिर कुछ ऐसा हुआ जिसे माई और दित्तो ने चमत्कार के रूप में देखा।

सूखा पेड़ हरा हो गया।

इसके बाद कच्ची कोठड़ी के महल में बदलने का प्रसंग आता है।

जिस घर में कुछ समय पहले गरीबी थी, वहां अब लोगों की भीड़ लगने लगी।

दूर-दूर से लोग गोरिया के दर्शन और अपनी परेशानियों का समाधान पाने आने लगे।

गोरिया की कथा में यह हिस्सा खास इसलिए है क्योंकि यहां कोई राजा नहीं है।

न कोई दरबार।

न सैनिक।

न सिंहासन।

सिर्फ एक गरीब घर और उसके दरवाजे पर बैठा एक साधु।


फिर स्वांखा में उनकी समाधि की कथा आई

गोरिया के जीवन का अंतिम पड़ाव भी स्वांखा से ही जुड़ा है।

स्थानीय परंपरा में उनकी समाधि सरोवर के बीच मानी जाती है और उनकी जलसमाधि का प्रसंग सुनाया जाता है।

यही सरोवर आज स्वांखा के तीर्थ की सबसे अलग पहचान है।

जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले में स्थित यह shrine हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। जिला प्रशासन के अनुसार, यहां लाखों लोग सालाना श्रद्धा अर्पित करने आते हैं और बाबा को कई समुदायों का आराध्य माना जाता है।

यानी गोरिया की यात्रा जिस राजसी दुनिया से शुरू हुई थी, उसका अंतिम दृश्य सत्ता का नहीं, पानी के बीच बनी समाधि का है।


समाधि के बाद भी स्वांखा में उनकी कहानी चलती रही

किसी संत की कथा समाधि पर खत्म हो सकती है।

गोरिया की कथा में ऐसा नहीं हुआ।

समाधि के साथ पूजा की परंपरा बनी।

सरोवर के साथ कई मान्यताएं जुड़ीं।

और फिर हर साल मेला लगने लगा।

जब मेला आता है तो स्वांखा का वातावरण बदल जाता है।

दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

सरोवर में स्नान करते हैं।

दर्शन करते हैं।

बाजार सजता है।

और अखाड़े में दंगल होता है।

कुछ देर के लिए वही स्थान, जहां बाबा की समाधि के सामने लोग सिर झुकाते हैं, पहलवानों की ताकत और मुकाबले का मैदान बन जाता है।

यही स्वांखा की खास तस्वीर है।

सरोवर।

समाधि।

मेला।

दंगल।

और इनके बीच बाबा सिद्ध गोरिया नाथ की कथा।


दूधिया विभूति और संकटमोचन जल

स्वांखा में गोरिया से जुड़ी मान्यताएं उनकी जीवनकथा तक सीमित नहीं हैं।

दूधिया विभूति को उनकी धूनी और साधना से जोड़ा जाता है। सरोवर के जल को लेकर भी संकटमोचन जल की मान्यता प्रचलित है।

इन मान्यताओं को लोकविश्वास के रूप में ही देखना चाहिए।

क्योंकि गोरिया की कथा में इतिहास और लोकस्मृति दोनों साथ चलते हैं।


राजा से बाबा तक

गोरिया की पूरी कथा को अगर एक ही दृश्य में समेटना हो तो शायद वह राजमहल का दृश्य नहीं होगा।

वह स्वांखा का सरोवर होगा।

क्योंकि कहानी के आरंभ में गोरिया की पहचान राजसी जीवन से जुड़ी है।

बीच में वह गुरु गोरखनाथ के सामने बैठा एक शिष्य है।

फिर वह बारह साल तक तपस्या करने वाला साधक बनता है।

फिर अलग-अलग स्थानों पर घूमने वाला सिद्ध।

फिर माई मथुरा जैसे लोगों के घर पहुंचने वाला बाबा।

और आखिर में स्वांखा के सरोवर से जुड़ी समाधि।

यही पूरी यात्रा उसे सिद्ध गोरिया नाथ बनाती है।

आज स्वांखा में जब मेला लगता है और हजारों-लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, तो वे किसी पुराने राजा की कहानी सुनने नहीं आते।

वे उस बाबा के दर्शन करने आते हैं, जिसकी कथा में राजमहल भी है, धूनी भी है, गुरु भी है और सरोवर भी।

और शायद गोरिया की कथा का सबसे बड़ा मोड़ भी यही था—

उसने राजसी पहचान हासिल करने के बाद उसे छोड़ दिया।

उसके बाद लोगों ने उसे उसके राजपाट से नहीं, उसकी साधना से याद रखा।

स्वांखा में आज मौजूद shrine, वार्षिक श्रद्धा-परंपरा और मंदिर से जुड़ी गतिविधियां इस स्मृति को जीवित रखती हैं। 

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