जम्मू की पुरानी लोककथाओं में बाबा बिरपनाथ का नाम एक ऐसी कहानी के साथ आता है, जिसकी शुरुआत एक छोटे से गांव और एक गरीब परिवार से होती है। उस समय कोई नहीं जानता था कि जिस बच्चे को गरीबी के कारण दूसरे लोगों के हाथ सौंप दिया जाएगा, वही आगे चलकर एक प्रसिद्ध नाथ योगी के रूप में याद किया जाएगा।
उस बालक का नाम था बीरू।
उसकी कहानी में सबसे दर्दनाक प्रसंग वह है जब उसे एक राजा के आदेश पर बलि देने के लिए ले जाया जाता है। लेकिन बलि की वेदी तक पहुंचने से पहले घटनाएं ऐसी बदलती हैं कि बीरू की जिंदगी ही दूसरी दिशा में चली जाती है।
गरीब परिवार में जन्मा था बीरू
प्रचलित कथा के अनुसार बीरू का जन्म एक गरीब जारड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। परिवार में पहले से सात बेटे थे और आठवें बच्चे के जन्म के बाद आर्थिक परेशानी और बढ़ गई।
लड्डा ब्राह्मण और उनकी पत्नी जमुना ने बच्चे को अपने पास रखने की इच्छा जताई। परिवार ने बीरू को उनके हवाले कर दिया।
कहा जाता है कि उसका जन्म वीरवार को हुआ था, इसलिए उसका नाम बीरू रखा गया।
कुछ समय बाद लड्डा और जमुना की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि घर चलाना मुश्किल हो गया। आखिरकार वही बच्चा, जिसे उन्होंने बेटे की तरह अपनाया था, धन के बदले बेच दिया गया।
बीरू को यह नहीं पता था कि उसके साथ आगे क्या होने वाला है।
राजा को एक ब्राह्मण बालक की तलाश थी
लोककथा के अनुसार राजा ने एक कुआं खुदवाया था, लेकिन काफी प्रयास के बावजूद उसमें पानी नहीं निकला।
राजा ने इसका कारण जानने की कोशिश की। तब एक साधु या जानकार व्यक्ति के माध्यम से यह बात सामने आई कि कुएं के भीतर एक राक्षस है।
कथा में राक्षस को शांत करने के लिए मानव बलि की शर्त सामने आती है। इसके लिए एक स्वस्थ और योग्य ब्राह्मण बालक की जरूरत बताई जाती है।
राजा के सैनिक ऐसे बच्चे की तलाश में निकल पड़े।
उनकी तलाश बीरपुर तक पहुंची।
धन के बदले बीरू को सौंप दिया गया
सैनिकों ने बीरू को देखा तो वह उनकी बताई शर्तों के अनुकूल था।
वे उसके परिवार के पास पहुंचे और पैसे देने की बात कही।
घर में पहले से गरीबी थी। धन की जरूरत ने माता-पिता को ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया, जिसे बाद में जमुना खुद भी गलत मानने लगी।
बीरू सैनिकों के साथ चला गया।
रास्ते में उसे यह नहीं बताया गया कि उसका अंत किस तरह होने वाला है।
वह एक ऐसे स्थान की तरफ ले जाया जा रहा था जहां उसकी बलि देने की तैयारी की जा रही थी।
बहवा में शुरू हुई बलि की तैयारी
बीरू को बहवा ले जाया गया।
कथा के अनुसार उसे नदी और पहाड़ी के पास एक झोपड़ी में रखा गया। चार सैनिक उसकी निगरानी कर रहे थे।
राजमहल से उसके लिए भोजन और दूसरी चीजें भेजी गईं, लेकिन बीरू ने उन चीजों को स्वीकार नहीं किया।
वह अकेला था।
इसी समय उसे अपने गुरु गोरखनाथ का स्मरण हुआ।
यहीं से कहानी में एक बड़ा बदलाव आता है।
संकट में बीरू ने गुरु गोरखनाथ को पुकारा
लोकमान्यता के अनुसार बीरू की पुकार गुरु गोरखनाथ तक पहुंची।
गुरु ने उसे रास्ता बताया और कुएं के पास जाकर एक विशेष उपाय करने को कहा।
बीरू ने गुरु के निर्देश का पालन किया।
उसने अपनी उंगली से रक्त की एक बूंद कुएं में गिराई।
इसके बाद कथा में कुएं से पानी निकलने का चमत्कारिक प्रसंग आता है।
जिस कुएं के कारण बलि की तैयारी हुई थी, वही कुआं अब बीरू की जान बचाने वाली घटना का केंद्र बन गया।
राजा के सामने बदल गया पूरा मामला
कुएं में पानी आने की खबर राजा तक पहुंची।
राजा और उसके लोग वहां पहुंचे। जिस बालक को बलि देने के लिए लाया गया था, अब उसी घटना ने राजा को राहत दी थी।
राजा ने बीरू से प्रसन्न होकर वरदान मांगना चाहा।
लेकिन बीरू के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं था।
उसने राजा को याद दिलाया कि उसे धन देकर खरीदा गया था और उसकी जान लेने की तैयारी की गई थी।
वह राजा के सामने झुकने के बजाय अपने साथ हुए अन्याय का जवाब देता है।
बीरू ने राजा को श्राप क्यों दिया?
कथा में यहीं बीरू के श्राप का प्रसंग आता है।
बीरू राजा से कहता है कि निर्दोष ब्राह्मण बालक की बलि देने का प्रयास गलत था।
राजा अपने लिए पुत्र का वरदान चाहता है, लेकिन बीरू उसे वरदान देने से इनकार करता है।
इसके बजाय कथा में उसके वंश को लेकर श्राप का वर्णन मिलता है।
एक अन्य प्रसंग में राजा के राज्य में कुएं, तालाब या नदी का पानी पीने वालों को ब्रह्म-रक्त के कारण गरीबी आने की बात कही जाती है।
ये बातें लोककथा का हिस्सा हैं और अलग-अलग परंपराओं में इनके रूप बदलते हुए मिलते हैं।
बीरू ने घर लौटने से भी इनकार कर दिया
राजा ने बीरू से कहा कि वह अपने माता-पिता के पास लौट जाए।
लेकिन बीरू ने यह स्वीकार नहीं किया।
उसका सवाल सीधा था—जिन लोगों ने धन के लिए उसे बेच दिया, वह उनके पास वापस क्यों जाए?
बलि की घटना ने उसके भीतर सांसारिक जीवन के प्रति एक अलग भाव पैदा कर दिया था।
अब उसे धन और परिवार से ज्यादा गुरु की शरण महत्वपूर्ण लगने लगी थी।
गुरु गोरखनाथ की शरण में पहुंचा बीरू
इसके बाद बीरू गुरु गोरखनाथ की शरण में जाता है।
गुरु उसकी परीक्षा लेते हैं और उसके मन में पैदा हुए वैराग्य को देखते हैं।
बीरू सांसारिक सुख-संपत्ति से दूर होकर योग का मार्ग चुनता है।
गुरु गोरखनाथ से दीक्षा मिलने के बाद उसके जीवन में बड़ा परिवर्तन आता है। नाथ परंपरा के अनुसार उसके कान छेदे जाते हैं, कुंडल धारण कराए जाते हैं और वह योगी जीवन में प्रवेश करता है।
यहीं से बीरू की पहचान बिरपानाथ के रूप में सामने आती है।
बलि की कथा का असली मोड़
बीरू की बलि वाली कहानी सिर्फ एक राजा और गरीब परिवार की कथा बनकर नहीं रह जाती।
इस घटना के बाद उसका पूरा जीवन बदल जाता है।
जिस बालक को एक कुएं के लिए बलि देने की तैयारी हुई थी, वही आगे गुरु गोरखनाथ का शिष्य बनता है। फिर उसकी कथा नाथपंथ, कलालगढ़, कलालिन और कई धार्मिक स्थलों से जुड़ती चली जाती है।
यही वजह है कि बाबा बिरपानाथ की लोककथा में बीरू की बलि वाला प्रसंग सबसे महत्वपूर्ण मोड़ों में से एक माना जाता है।
इतिहास के स्तर पर इन घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है। लेकिन डुग्गर की मौखिक परंपरा में यह कहानी लंबे समय से सुनाई जाती रही है और आज भी बाबा बिरपानाथ की पहचान से जुड़ी हुई है।
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