एक नौजवान अपने घर से दूर बगदाद की तरफ निकल रहा था। मंज़िल आसान नहीं थी और रास्ते में क्या होगा, इसका अंदाज़ा भी नहीं था। लेकिन रवाना होते वक्त उसकी वालिदा ने उसे एक ऐसी बात कही थी, जो आगे चलकर उसी सफर में उसके सामने इम्तिहान बनकर आने वाली थी।
झूठ मत बोलना।
यह नौजवान थे हज़रत शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह।
रास्ते में जिस काफिले के साथ वह जा रहे थे, उस पर डाकुओं ने हमला कर दिया। यात्रियों से उनके पास मौजूद माल के बारे में पूछा जाने लगा। जब हज़रत से पूछा गया, तो उन्होंने अपने पास मौजूद सोने के सिक्कों के बारे में सच-सच बता दिया।
डाकुओं को यकीन नहीं हुआ। जिस चीज़ को वह आसानी से छिपा सकते थे, उसका पता खुद क्यों बताया?
जवाब में हज़रत ने अपनी वालिदा से किया हुआ वादा बताया। रिवायत में आता है कि इस जवाब का डाकुओं के सरदार पर असर हुआ और इस घटना ने उनके रवैये में बदलाव ला दिया।
गिलान से बगदाद का यह सफर अभी शुरू ही हुआ था। आगे वह शहर था जहां हज़रत ने इल्म हासिल किया, रियाज़त की और फिर ऐसी मजलिसें कायम हुईं जिनमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचने लगे।
लेकिन उस मुकाम तक पहुंचने से पहले उनकी ज़िंदगी में एक लंबा और कठिन दौर आने वाला था।
गिलान से बगदाद की तरफ
हज़रत शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह की पैदाइश 470 हिजरी, 1077 ईस्वी में रमज़ान के महीने में गिलान के नाइफ़ इलाके में बताई गई है।
उनके वालिद का नाम अबू सालेह और वालिदा का नाम उम्मुल-खैर फ़ातिमा बताया गया है। नसब के सिलसिले में वालिद की तरफ से हज़रत हसन और वालिदा की तरफ से हज़रत हुसैन की नस्ल से संबंध का उल्लेख मिलता है।
बचपन से ही उनके अंदर गौर-ओ-फ़िक्र और इल्म की तरफ रुझान बताया गया है। करीब 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने बगदाद जाने की इच्छा जताई, ताकि वहां दीनी इल्म हासिल कर सकें।
घर से निकलते वक्त मां की वह नसीहत उनके साथ थी—सच को किसी हालत में न छोड़ना।
और रास्ते में डाकुओं के सामने वही बात पहली बार आज़माई गई।
बगदाद पहुंचकर शुरू हुआ दूसरा दौर
बगदाद उस समय इल्म का बड़ा मरकज़ था। हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह यहां पहुंचे तो उनका मकसद सिर्फ इल्म हासिल करना नहीं था। आगे के विवरण में उनकी ज़िंदगी का एक ऐसा दौर सामने आता है जिसमें तालीम के साथ सख्त रियाज़त और मुजाहदा भी शामिल था।
उन्होंने रोज़े रखे, दुनियावी सहूलियतों को सीमित किया और इबादत पर ज्यादा तवज्जो दी। इस दौरान कठिन हालात में गुज़ारा करने और अपनी जरूरतों को कम रखने का उल्लेख मिलता है।
यह वह दौर था जब बगदाद में उनकी पहचान अभी किसी बड़ी मजलिस या बड़ी तादाद में आने वाले लोगों से नहीं बनी थी।
पहले उन्हें खुद को तैयार करना था।
जब रूहानी इम्तिहान सामने आया
इसी रूहानी मुजाहदे से जुड़े विवरणों में एक मशहूर रिवायत आती है।
कहा गया है कि एक मौके पर उन्हें ऐसा भ्रम पैदा करने की कोशिश हुई कि अब उन पर धार्मिक पाबंदियां लागू नहीं रहीं। इस प्रसंग के दो अलग बयान मिलते हैं। एक में आवाज़ का ज़िक्र है, जबकि दूसरे में जंगल में एक रोशन आकृति दिखाई देने और उसके जरिए खुद को ईश्वरीय आदेश से जोड़ने की कोशिश का वर्णन है।
हज़रत ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया।
रिवायत के दूसरे बयान में बाद में उस रोशन आकृति का रूप बदल जाता है और उसका असल भेद सामने आता है।
इस प्रसंग के दो अलग रूप मिलते हैं, इसलिए इसे इतिहास की प्रमाणित घटना की तरह नहीं, बल्कि हज़रत से जुड़ी रूहानी रिवायत के तौर पर देखना चाहिए।
तन्हाई से लोगों के बीच तक
एक वक्त ऐसा आया जब रियाज़त और मुजाहदे का यह दौर लोगों के बीच इल्म और रहनुमाई के काम में बदलने लगा।
करीब 521 हिजरी के आसपास बगदाद में उनकी तालीमी और बयान की गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। शुरुआत में उनके पास आने वाले लोगों की संख्या कम थी। फिर धीरे-धीरे यह मजलिस बढ़ती गई।
बुधवार और शुक्रवार की मजलिसों में लोग आने लगे। जगह कम पड़ने लगी तो बड़ी जगह की जरूरत हुई। बगदाद के बाहर भी उनके बयान होने और वहां उनके लिए स्थान बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।
यहां आने वालों में सूफिया, फुक़हा और इल्म के तालिब शामिल थे।
सुबह कुरआन, तफ़्सीर और हदीस की तालीम होती। बाद में लोग अपने धार्मिक सवाल लेकर आते और जवाब हासिल करते।
जिस शख्स ने कभी बगदाद आने के लिए अपना घर छोड़ा था, अब उसी शहर में लोग उसकी मजलिस तक पहुंचने लगे थे।
घर की ज़िंदगी भी इसी सफर का हिस्सा थी
हज़रत शेख की ज़िंदगी का एक पहलू उनकी तालीम और इबादत से जुड़ा था, लेकिन इसके साथ घर और परिवार भी था।
उनकी शादी का समय करीब 521 हिजरी बताया गया है, जब उनकी उम्र लगभग 51 वर्ष थी। चार निकाहों और कुल 49 बच्चों का उल्लेख मिलता है—27 बेटे और 22 बेटियां।
उनके चार बेटों का विशेष रूप से उल्लेख मिलता है।
शेख अब्दुल वहाब सबसे बड़े बेटे थे और इल्म में प्रतिष्ठित थे। बाद में उन्हें मदरसे की जिम्मेदारी मिली।
शेख ईसा हदीस के शिक्षक थे और सूफी विषयों पर लिखने का भी उल्लेख मिलता है।
शेख अब्दुर रज्जाक आलिम और हाफिज बताए गए हैं। उनके बारे में सच्चाई और भरोसेमंदी की प्रतिष्ठा का ज़िक्र है।
शेख मूसा भी इल्म रखने वाले थे और बाद में दमिश्क चले गए।
इस तरह उनकी ज़िंदगी में लोगों की रहनुमाई के साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी चलती रहीं।
दिन लोगों के लिए, रात इबादत के लिए
हज़रत की रोज़मर्रा की दिनचर्या के विवरण में सुबह से रात तक का एक व्यवस्थित सिलसिला दिखाई देता है।
सुबह कुरआन, तफ़्सीर और हदीस की तालीम। दोपहर में धार्मिक सवालों के जवाब। शाम को गरीबों के लिए खाना। रमज़ान में इफ्तार के वक्त गरीबों को भी साथ शामिल करना।
और जब ईशा के बाद लोगों की आवाजाही थम जाती, तो रात का वक्त इबादत में गुज़रता।
उनकी ज़िंदगी के इस हिस्से में इल्म, इबादत और गरीबों की खिदमत एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते।
91 साल की उम्र में विसाल
हज़रत शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह का विसाल 561 हिजरी, 1166 ईस्वी में बताया गया है। उस समय उनकी उम्र 91 वर्ष थी और तारीख 11 रबी-अल-आख़िर दी गई है।
उनके विसाल के बाद उनके बेटों और मुरीदों ने उनकी तालीम को आगे बढ़ाया। इसी सिलसिले में क़ादिरिया परंपरा का उल्लेख मिलता है। उनकी मशहूर रचनाओं में Futuh al-Ghaib का नाम आता है। Fath al-Rabbani को उनके sermons के संग्रह के रूप में बताया गया है।
गिलान से निकला वह सफर, जो बगदाद में ठहर गया
गिलान से निकलते वक्त हज़रत शेख के पास मां की एक नसीहत थी।
रास्ते में उसी नसीहत की परीक्षा हुई।
बगदाद पहुंचे तो इल्म और रियाज़त का कठिन दौर आया। फिर वही शख्स लोगों के बीच आया और उसकी मजलिसों में धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती गई। सुबह इल्म की तालीम, दिन में लोगों के सवाल और शाम को गरीबों के लिए खाना—और रात इबादत में।
इस सफर में उनकी ज़िंदगी के कई रंग एक साथ दिखाई देते हैं।
और शायद इसी वजह से गिलान से बगदाद तक का यह सफर सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने की कहानी नहीं रह जाता। यह उस रास्ते का सिलसिला बन जाता है जिसमें मां की नसीहत से शुरू हुआ एक इम्तिहान, इल्म और रियाज़त से गुजरते हुए लोगों की रहनुमाई तक पहुंचता है।
बाद की सूफी परंपरा में हज़रत शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह को बड़ी अकीदत के साथ याद किया गया और ग़ौस-ए-आज़म के नाम से उनकी पहचान दूर-दूर तक कायम हुई।
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