दर्जी के हाथ में कपड़ा था, लेकिन उसके सामने ऐसी मुश्किल खड़ी थी जिसका कोई आसान रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।
वस्त्र तैयार करना था, मगर शर्त थी कि उसमें सिलाई का निशान न हो।
वह देर तक सोचता रहा। कपड़े को देखता, फिर अपनी कारीगरी को। जितना सोचता, उलझन उतनी ही बढ़ती जाती।
आखिर उसने किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाने का फैसला किया, जिसके बारे में उसे भरोसा था कि शायद उसकी यह मुश्किल हल हो सकती है।
उसे क्या मालूम था कि कपड़े की इस छोटी-सी उलझन के बहाने वह जिस योगी के सामने पहुंचने वाला है, वही मुलाकात आगे चलकर गोरिया की पूरी जिंदगी की दिशा बदल देगी।
उस योगी का नाम था गुरु गोरखनाथ।
और यहीं से गोरिया की वह यात्रा शुरू होती है, जिसमें राजसी जीवन पीछे छूटता है और साधना उसकी नई पहचान बन जाती है।
राजमहल से निकलकर योगी की राह पर
गोरिया के जीवन की शुरुआत राजसी वातावरण से जुड़ी लोककथा से होती है।
प्रचलित कथा के एक रूप में उसका संबंध राजा वीरमदेव के राजघराने से बताया गया है। महल में पला-बढ़ा गोरिया उस जीवन से परिचित था जहां आदेश देने वाला व्यक्ति वही होता है जिसकी बात अंतिम मानी जाती है।
लेकिन समय के साथ उसके जीवन में बदलाव आने लगा।
गुरु गोरखनाथ से मुलाकात के बाद कथा उसे धीरे-धीरे योग और साधना की ओर ले जाती है।
अब सवाल यह नहीं था कि गोरिया के पास क्या है।
सवाल यह था कि वह क्या छोड़ सकता है।
राजसी सुख-सुविधाएं छोड़ना एक बात थी, लेकिन अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलना उससे कहीं कठिन।
फिर भी गोरिया ने वही राह चुनी।
गुरु के सामने राजसी पहचान काम नहीं आई
गुरु की संगत में आने के बाद गोरिया को साधु के जीवन की कठिनाइयों से गुजरना पड़ा।
जिस जीवन में कभी सुविधा थी, उसमें अब साधारण भोजन और भिक्षा का प्रसंग आता है।
जिस व्यक्ति के आसपास कभी सेवक रहे होंगे, उसे अब साधुओं के साथ रहना था।
गुरु की राह में सबसे पहले वही चीजें छूटती हैं जिन्हें इंसान अपने बारे में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है।
गोरिया के लिए वह चीज उसकी राजसी पहचान थी।
कथा में गुरु गोरखनाथ के साथ उसकी साधना और यात्राओं के कई प्रसंग आते हैं। समय बीतने के साथ गोरिया का जीवन पूरी तरह योगी की राह पर बढ़ता गया।
फिर शुरू हुई वह तपस्या, जिसने सब बदल दिया
गुरु के साथ रहने के बाद गोरिया तपस्या की ओर बढ़ा।
यह कोई कुछ दिनों की साधना नहीं थी।
लोककथा में बारह वर्ष की कठिन तपस्या का प्रसंग मिलता है।
कल्पना कीजिए—
एक ऐसा व्यक्ति जो कभी राजमहल की छाया में रहा हो, अब किसी तपस्थल पर बैठा है।
सामने धूनी जल रही है।
दिन गुजरते हैं।
रातें गुजरती हैं।
मौसम बदलते हैं।
लेकिन साधक अपनी जगह से नहीं हटता।
बारह साल तक उसी साधना में लगे रहने की कथा गोरिया के जीवन को उस मोड़ पर ले जाती है जहां उसका पुराना परिचय धीरे-धीरे धुंधला पड़ जाता है।
बारह साल बाद गुरु फिर उसी तपस्थल पर आए
समय अपनी रफ्तार से गुजरता रहा।
गोरिया तपस्या करता रहा।
फिर एक दिन गुरु गोरखनाथ उसके पास पहुंचे।
गुरु ने अपने शिष्य को देखा।
जिस गोरिया को कभी राजसी जीवन से जोड़ा जाता था, वह अब वर्षों की साधना के बाद उसी राह पर खड़ा था जिसे उसने गुरु के कहने पर चुना था।
यह केवल गुरु और शिष्य की मुलाकात नहीं थी।
यह उस यात्रा की परीक्षा थी जो वर्षों पहले शुरू हुई थी।
कथा के अनुसार, गुरु ने उसकी साधना को परखा और आगे उसे सिद्ध साधक के रूप में स्वीकार किया। इसी क्रम में उसका नाम सिद्ध गोरिया नाथ के रूप में स्थापित होने की कथा आगे बढ़ती है।
अब गोरिया के साथ चमत्कारों की कथाएं भी जुड़ने लगीं
साधना के बाद गोरिया की यात्राएं जारी रहीं।
वह अलग-अलग स्थानों पर गया और साधुओं की मंडलियों के साथ रहा।
जहां वह पहुंचा, वहां उसके जीवन से जुड़े नए प्रसंग लोककथा का हिस्सा बनते गए।
कपला पीर के स्थान से जुड़ी कथा में धूनी के पास बैठे साधुओं का प्रसंग आता है। इसी दौरान शेर से जुड़ी एक असाधारण घटना का वर्णन मिलता है, जिसे गोरिया की सिद्धि से जोड़ा जाता है।
इसके बाद गोरिया के नाम से कई दूसरे चमत्कारिक प्रसंग भी सुनाए जाने लगे।
धूनी।
पानी।
गायें।
साधु।
इन घटनाओं को लेकर अलग-अलग लोकविश्वास हैं और इन्हें उसी लोकपरंपरा के संदर्भ में देखना चाहिए।
लेकिन उनकी यात्रा का सबसे बड़ा पड़ाव अभी बाकी था
कई स्थानों से गुजरने के बाद गोरिया की कथा स्वांखा तक पहुंचती है।
आज जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले का स्वांखा बाबा सिद्ध गोरिया नाथ की समाधि और मंदिर के लिए जाना जाता है। जिला प्रशासन भी इस स्थान को बाबा सिद्ध गोरिया के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के रूप में दर्ज करता है और उन्हें गुरु गोरखनाथ का अनुयायी बताता है।
यहां पहुंचकर कहानी का वातावरण बदल जाता है।
यात्राओं की जगह एक सरोवर है।
और उस सरोवर के बीच बाबा की समाधि।
सरोवर के बीच समाधि
स्थानीय परंपरा बाबा गोरिया के अंतिम समय को इसी सरोवर से जोड़ती है।
कथा के अनुसार, उन्होंने जलसमाधि ली और उनकी समाधि सरोवर के बीच स्थित हुई।
आज श्रद्धालु इसी स्थान पर पहुंचते हैं। सरोवर में स्नान करते हैं और समाधि के दर्शन करते हैं। जल को लेकर भी स्थानीय मान्यताएं लंबे समय से चली आ रही हैं।
यही वह जगह है जहां गोरिया की पूरी यात्रा जैसे एक तस्वीर में सिमट जाती है।
एक तरफ राजसी जीवन की शुरुआत।
दूसरी तरफ सरोवर के बीच समाधि।
और दोनों के बीच गुरु गोरखनाथ से शुरू हुई साधना की लंबी राह।
गुरु की सीख से बनी एक परंपरा
गोरिया की कहानी में गुरु गोरखनाथ की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन इसी संबंध के बाद आता है।
राजसी पहचान से निकलकर साधु बनना।
गुरु के साथ रहना।
कठिन तपस्या करना।
फिर यात्राएं करना।
और अंततः स्वांखा से जुड़ जाना।
डुग्गर की लोकपरंपरा में यही यात्रा गोरिया को बाबा सिद्ध गोरिया नाथ के रूप में याद करने का आधार बनती है।
और आज भी जब स्वांखा में मेला लगता है, तो यह कथा केवल सुनाई नहीं जाती—उसका एक हिस्सा जैसे सामने दिखाई देता है।
सरोवर में स्नान करते श्रद्धालु।
समाधि के सामने झुकते लोग।
मंदिर में पूजा।
और मेले में सजता दंगल।
गोरिया की कहानी का सबसे बड़ा मोड़ शायद वही था जब उसने गुरु गोरखनाथ के सामने अपनी पुरानी पहचान पीछे छोड़ दी थी।
क्योंकि उस दिन उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ था।
लेकिन उसी दिन से उसके पास पाने के लिए एक नई राह भी थी।
राजा से योगी बनने की राह।
और उसी राह के अंतिम छोर पर स्वांखा में आज भी लोग उसे सिद्ध गोरिया नाथ के नाम से याद करते हैं।
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