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राजा गोरिया की गुरु गोरखनाथ से मुलाकात: कैसे बने उनके शिष्य

राजा गोरिया की गुरु गोरखनाथ से पहली मुलाकात

गोरिया के सामने उस समय एक ऐसा जीवन था, जिसमें राजपाट था, धन था और सत्ता थी। लेकिन इसी जीवन के बीच एक ऐसा प्रसंग आया, जिसने उन्हें गुरु गोरखनाथ तक पहुंचा दिया।

शुरुआत एक दर्जी से हुई।

राजा ने अपने दर्जी को ऐसा सूट तैयार करने का आदेश दिया था, जिसमें सुई और धागे का इस्तेमाल न हुआ हो।

दर्जी के लिए यह काम मुश्किल था। उसने कोशिश की, लेकिन कोई रास्ता नहीं निकला। इसी परेशानी के बीच उसकी भेंट गुरु गोरखनाथ से हुई। गुरु ने उसे ऐसा उपाय बताया, जिससे बिना सुई-धागे का सूट तैयार हो गया। 

दर्जी वह सूट लेकर राजा के सामने पहुंचा।

गोरिया ने कपड़ा देखा तो पूछ लिया कि इसे किसने बनाया है।

दर्जी ने साधु के बारे में बताया।

राजा ने उसी साधु को महल में बुलाने के लिए कहा।

और कुछ समय बाद गोरिया के सामने वह योगी खड़ा था, जिसकी वजह से एक असंभव-सा काम पूरा हुआ था।

वह गुरु गोरखनाथ थे।

गुरु को देखते ही गोरिया ने क्या किया?

गोरिया ने गुरु गोरखनाथ को देखा तो उनके सामने घुटनों के बल बैठ गए और उनके चरण छुए।

उन्होंने गुरु से अपने साथ चलने और उनका शिष्य बनने की अनुमति मांगी।

लेकिन गोरखनाथ ने तुरंत उनकी बात स्वीकार नहीं की।

सामने एक राजा था। राजपाट और संपत्ति छोड़कर साधु का जीवन अपनाना आसान फैसला नहीं था। गुरु ने साफ कर दिया कि अगर गोरिया उनके साथ चलना चाहते हैं तो उन्हें अपना धन, संपत्ति और राजसी जीवन छोड़ना होगा।

गोरिया पीछे नहीं हटे।

उन्होंने कहा कि वह सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हैं। जिस जीवन को अब तक जीते आए थे, उससे उनका मन हट चुका था और वह गुरु की शरण में जाना चाहते थे। 

गोरखनाथ ने आखिर उन्हें अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।

यहीं से गोरिया की जिंदगी में वह बदलाव शुरू हुआ, जिसकी शुरुआत राजमहल में हुई थी लेकिन मंजिल साधना के रास्ते पर मिलने वाली थी।

गुरु के साथ तपोवन पहुंचे गोरिया

गुरु गोरखनाथ गोरिया को अपने साथ लेकर तपोवन पहुंचे।

वहां उन्होंने गोरिया को तपस्या करने के लिए कहा और स्वयं आगे चले गए।

गोरिया वहीं रह गए।

गुरु की आज्ञा थी, इसलिए उन्होंने उस स्थान को नहीं छोड़ा। साधना चलती रही और समय बीतता गया।

बारह वर्ष तक गोरिया ने तपस्या की। 

इन बारह वर्षों का अगला प्रसंग गोरिया की पूरी कथा में सबसे असाधारण घटनाओं में से एक है।

बारह साल बाद गुरु लौटे, लेकिन गोरिया कहीं दिखाई नहीं दिए

गुरु गोरखनाथ जब ज्वाला जी पहुंचे तो उन्हें अपने उस शिष्य की याद आई, जिसे उन्होंने तपोवन में तपस्या के लिए छोड़ा था।

वह उसी जगह लौटे।

लेकिन गोरिया वहां दिखाई नहीं दिए।

गोरखनाथ ने आसपास मौजूद चरवाहों से उनके बारे में पूछा।

चरवाहों ने बताया कि एक साधु वर्षों तक वहां तपस्या करता रहा था। बाद में उसका शरीर हड्डियों के ढांचे जैसा हो गया और वह मिट्टी की बरमी में ढक गया। 

गुरु उस जगह पहुंचे।

उन्होंने गोरिया को आवाज लगाई।

बरमी के भीतर से जवाब आया कि वह उठ नहीं सकता।

गोरखनाथ ने उन्हें वहां से बाहर निकाला।

बारह साल की तपस्या के बाद गोरिया अब उस अवस्था में पहुंच चुके थे, जिसके लिए उन्होंने राजपाट छोड़ा था।

गुरु गोरखनाथ ने उन्हें “सिद्ध गोरिया” नाम दिया।

इसके बाद वे उन्हें टिल्ला योगियों के पास ले गए। वहां प्रधान साधु कपला पीर ने उनके कान में छेद किए और उन्हें नाथ समुदाय के संस्कार दिए। 

राजा गोरिया से सिद्ध गोरिया तक

गोरिया के जीवन का यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बदलाव केवल राजपाट छोड़ने तक नहीं रुकता।

पहले गुरु की तलाश हुई।

फिर गुरु के सामने अपना सब कुछ छोड़ने की तैयारी रखी गई।

उसके बाद तपोवन में बारह साल की साधना हुई।

और अंत में गुरु गोरखनाथ ने उन्हें सिद्ध गोरिया के नाम से स्वीकार किया।

अब गोरिया की अगली यात्रा राजमहल की ओर नहीं थी।

कुछ समय टिल्ला योगियों के साथ बिताने के बाद उन्होंने गुरु गोरखनाथ से देश-भ्रमण की अनुमति ली और यात्रा पर निकल पड़े। 

यहीं से उनकी कहानी एक नए दौर में प्रवेश करती है।

आगे की यात्रा उन्हें स्वांखा तक ले जाएगी, जहां माई मथुरा, गरीब ब्राह्मण परिवार और बाद में कपला पीर से जुड़े प्रसंग सामने आते हैं। ये घटनाएं गोरिया की उस पहचान से जुड़ी हैं, जो उन्हें आगे चलकर स्वांखा के बाबा सिद्ध गोरिया नाथ के रूप में स्थापित करती है। 

लेकिन उस यात्रा पर निकलने से पहले एक बात तय हो चुकी थी।

गोरिया अब राजा नहीं रहे थे।

गुरु गोरखनाथ ने उन्हें राजपाट से निकालकर साधना के रास्ते पर ला दिया था और बारह साल की तपस्या के बाद वही गोरिया सिद्ध गोरिया बन चुके थे।

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