आज वो रास्ता चल रहा था… लेकिन मंज़िल उसे समझ नहीं आ रही थी।
दिल में एक अजीब सी खिंचाव था, जैसे कोई उसे बुला रहा हो।
वो अपने मुर्शिद के पास पहुँचा और बोला,
“हज़रत… Kya hum Rab ko dhoondte hain ya Rab hume? समझ नहीं आता ये सफर किसका है।”
मुर्शिद ने मुस्कुराकर कहा,
“बेटा, अगर तू उसे ढूंढ रहा है… तो समझ ले, वो पहले से तुझे बुला रहा है।”
“इंसान खुद से कभी रब की तरफ नहीं जाता…
जब तक रब उसे अपनी तरफ खींच न ले।”
उन्होंने समझाया,
“जैसे कोई प्यासा पानी ढूंढता है…
लेकिन असल में पानी ही उसकी प्यास को खींच रहा होता है।”
तालिब की आँखों में एक अलग सी चमक आ गई।
मुर्शिद बोले,
“कुरआन हमें याद दिलाता है कि अल्लाह अपने बंदों के बहुत करीब है…
और हमारे नबी ﷺ ने सिखाया कि जब बंदा एक कदम बढ़ाता है, अल्लाह कई कदम उसकी तरफ बढ़ता है।”
“तो ये सवाल नहीं कि तू उसे ढूंढ रहा है या वो तुझे…
असल बात ये है कि ये सफर दोनों तरफ से है।”
✨ “रब की तलाश भी उसी का करम है… और मिलना भी उसी की रहमत।”
मुर्शिद ने आख़िर में कहा,
“बस दिल को सच्चा रख…
रास्ता खुद तुझे मंज़िल तक पहुंचा देगा।”
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