आज वो आईने के सामने खड़ा था…
लेकिन उसे अपना चेहरा नहीं, अपने अंदर का सवाल दिख रहा था।
नाम, पहचान, रिश्ते — सब कुछ था…
फिर भी दिल पूछ रहा था, “मैं असल में कौन हूँ?”
वो एक सूफी बुज़ुर्ग के पास पहुँचा और धीरे से बोला,
“हज़रत… Main kaun hoon ? जो दिखता हूँ, क्या मैं वही हूँ?”
बुज़ुर्ग ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“नहीं बेटा… जो दिखता है, वो तू नहीं…
जो महसूस करता है, वो भी पूरा तू नहीं…”
“तू वो है जो इन सबको देख रहा है —
तेरी रूह, जो अल्लाह से आई है।”
उन्होंने समझाया,
“जैसे कोई आईना खुद कुछ नहीं होता…
लेकिन हर चीज़ को दिखाता है —
वैसे ही तेरी रूह इस दुनिया को देखती है।”
तालिब की आँखों में गहराई आ गई।
बुज़ुर्ग बोले,
“कुरआन हमें याद दिलाता है कि इंसान को एक खास मकसद से पैदा किया गया है…
और हमारे नबी ﷺ ने सिखाया कि दिल को साफ करके इंसान अपनी असल पहचान के करीब आता है।”
“जब तू खुद को सिर्फ नाम, शरीर और दुनिया से जोड़ता है —
तू खुद को भूल जाता है…”
“और जब तू अपनी रूह को पहचानता है —
तू अपने रब के करीब हो जाता है।”
✨ “खुद को ढूंढना ही रब तक पहुंचने का पहला कदम है।”
बुज़ुर्ग ने आख़िर में कहा,
“आईने में मत देख…
अपने दिल में देख — वहीं तुझे तू मिलेगा।”
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